
जवाजा। कहते हैं कि दवा और दुआ जहाँ एक साथ मिल जाएँ, वहाँ चमत्कार होते हैं, लेकिन कभी-कभी नियति इंसान की हर कोशिश पर भारी पड़ जाती है। राजसमंद जिले के भीम उपखंड क्षेत्र के तारागढ़ गांव निवासी दिलीप सिंह के जीवन में भी ऐसा ही हृदयविदारक दृश्य सामने आया, जहाँ पत्नी को बचाने के लिए पति ने 10 दिन तक लगातार संघर्ष किया, लेकिन अंततः जिंदगी की जंग हार गई।
जानकारी के अनुसार तारागढ़ निवासी दिलीप सिंह की पत्नी मीरा देवी (35) छह माह की गर्भवती थीं। 15 दिसंबर को अचानक पेट में तेज दर्द उठने पर दिलीप उन्हें बेहतर इलाज के लिए अहमदाबाद लेकर गए, जहाँ अस्पताल में भर्ती कर उपचार शुरू किया गया। सूचना मिलने पर मीरा देवी की माँ घीसी देवी तथा भाई रमेश सिंह व छगन सिंह भी अहमदाबाद पहुँचे और बच्चों की देखभाल में सहयोग किया।
21 दिसंबर तक अहमदाबाद में उपचार के बाद चिकित्सकों ने छुट्टी दे दी, लेकिन घर लौटते समय भीम के समीप बर क्षेत्र में मीरा देवी की तबीयत फिर बिगड़ गई। आनन-फानन में उन्हें भीम के जिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहाँ से गंभीर हालत को देखते हुए अजमेर के विक्टोरिया जेएलएन अस्पताल रेफर किया गया। यहाँ दो दिनों तक मीरा देवी वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती रहीं, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
अस्पताल के गलियारों में दिलीप सिंह की दिन-रात की भागदौड़ हर किसी की आँखें नम कर रही थी। दवाइयों की व्यवस्था, जांचें, डॉक्टरों से संपर्क—पति ने एक पल के लिए भी पत्नी का साथ नहीं छोड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि इस कलयुग में दिलीप सिंह ने पति धर्म का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह दुर्लभ है।
मीरा देवी अपने पीछे तीन मासूम बच्चों को छोड़ गई हैं—13 वर्षीय बेटी, 12 वर्षीय बेटा और महज एक वर्ष की दूधमुंही बच्ची। माँ का साया उठने से तीनों बच्चों का भविष्य चिंता का विषय बन गया था।
अंतिम संस्कार के बाद दिलीप सिंह गांव लौट आए। ऐसे कठिन समय में मीरा देवी की माँ घीसी देवी, जो नाईकला गांव की निवासी हैं, ने आगे बढ़कर ममता की मिसाल पेश की। उन्होंने तीनों बच्चों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेने का निर्णय किया है। घिसी देवी नानी ने भावुक स्वर में कहा—
“भगवान को कुछ और ही मंजूर था। हमने बहुत दुआएँ कीं, दिलीप ने बहुत संघर्ष किया, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। अब ये बच्चे ही हमारी दुनिया हैं।”




